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यहाँ घास की रोटी खाने को मजबूर हैं लोग

Posted On: 9 Dec, 2015 हास्य व्यंग में

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पहले लोग विदेशी आटा खाते थे. अब बाजार में स्वदेशी “आटे” का स्टॉक है. फोन की घंटियाँ बज रहीं हैं, मेल पर मेल किये जा रहा है. रिटेलर परचेजिंग ऑर्डर दिये जा रहे हैं. जीभ को पहली बार स्वेदशी आटा खाने की आस जगी है. सो, स्वदेशी आटा बनाने का एकाधिकार बाबा के पास ही है. बाबा लगे हुए हैं. स्वदेशी-विदेशी के नाम पर ध्रुवीकरण आसान है और वह दिख भी रहा है. इससे पहले कि एस एस राजामौली इस राष्ट्रीय रहस्य से पर्दा उठाते कि, “कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा” शुभचिंतक बाहुबली का विकल्प जयललिता के रूप में पेश करने लगे हैं.



grass roti


चेन्नई के बाढ़ की भयावहता कम हो रही है. उस दौरान उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से 50 को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया था. इसकी खबर इक्के-दुक्के चैनल को छोड़ शायद ही कहीं थी. एक टीवी चैनल की ख़बर के मुताबिक अत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की सीमा में आने वाले लालवाड़ी गाँव में लोग रोटी खाने को मजबूर हैं. वहाँ स्वदेशी-विदेशी आटे से परे लड़ाई भूख से लड़ी जा रही है. उनकी रोटी घास की है. न कोई पेटेंट, न ही कोई ट्रेडमार्क!


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उस दौर में जब चुनाव नजदीक होने के कारण मंदिर और मस्जिद बनाने की बात फिर से तेज हो गयी है, घास की रोटी पर केवल गरीबों का हक बना हुआ है. यह हक बना भी रहना चाहिये, निरंतर. जब घास की अपेक्षा मध्य और रईस वर्ग को नहीं है तो गरीबों को उसकी उपेक्षा से बचना चाहिये. टीवी चैनल की रिपोर्ट के अनुसार यहाँ लोग नदी किनारे उगी एक खास तरह की घास को सिलबट्टे रूपी पत्थर के सहारे पीसकर और पकाकर रोटी की शक्ल देते हैं. इस घास को समाई कहा जाता है. समाई से तैयार खाने के पकने के बाद भी उससे घास और कीचड़ की महक आती है.


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इस क्षेत्र का सामान्य भोजन गेहूँ के आटे से तैयार रोटी, दाल व सब्जी है. हालांकि, यहाँ का मौसाम अभी सामान्य नहीं है. देश में उबाल है, असहिष्णुता-सहिष्णुता, राष्ट्रीय-विदेशी का मुद्दा ज्यादा बड़ा है. चेन्नई में लोगों की जान बचाने वाली सेना बाहुबली है या मुख्यमंत्री जयललिता! यह गम्भीर मुद्दा है. पहले उसे सॉल्व किया जा रहा है. शेष एलैक्ट्रॉनिक चैनल अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं. कपिल शर्मा तो पहले भी लोगों को हँसा रहे थे. बाजीराव मस्तानी भी बस रिलीज होने ही वाली है. जरूरतमंद सवर्णों को आरक्षण भी तो चाहिये जिसमें मंडल के कुछ झंडाबरदार अडंगा डालना चाह रहे हैं. नेशनल हेराल्ड का हंगामा बाकी है और जीएसटी भी पास होनी है. तब तक उन्हें हरी घास पर अपना एकाधिकार समझना चाहिये जब तक कि घास भी स्वदेशी-विदेशी की लड़ाई में घसीट न ली जाये!Next…


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