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चुपचाप समाज सेवा करो

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राजनीति अपने भीतर बहुत कुछ समाए रखती है, जो समय-समय पर अपने वर्चस्व के लिए लड़ने वालों को नए तारह के आयाम प्रदान करती है. इस आयाम से आई भिन्नता तथ्य को बखूबी उजागर करती है जो पूरी तरह यथार्थ से परिपूर्ण होती है. इस यथार्थ को भले ही दबाया जाता रहा है और शायद आगे भी दबाया जाता रहेगा पर जब भी वो निकल कर बाहर आएगा क्रांति की एक नई पृष्ठभूमि तैयार करेगा. अपने अंतर्कलह से पाकिस्तान पहले ही क्या कम परेशान था जो उसके ऊपर रोज ही नई-नई मुसीबतों के बादल बरस रहे हैं. अभी जहां पाकिस्तान अपने सारे काम छोड़ कर भारत के ऊपर हमले कर रहा था वहीं फिर से उसे उसके आंतरिक कलह ने झकझोर कर रख दिया है. भारत की तुलना में अगर देखा जाए तो पाकिस्तान में भी एक अन्ना हजारे का प्रादुर्भाव हुआ है जिसने अपनी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई है.


tahirul kadri

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शायद यह पहली बार है: विश्व के अन्य देशों में शायद ऐसा होते हुए देखा गया है पर पाकिस्तान में ऐसा होना कुछ अटपटा सा लगता है. यहां तो सीधे अपने फायदे के लिए सत्ता से खदेड़ दिया जाता है पर इस प्रकार का जनाक्रोश काफी अलग है. क्यों और कैसे इस प्रकार की क्रांति हुई है इसके बारे में सोचने से ज्यादा इस बात पर विचार किया जा रहा है कि कैसे इस जन आंदोलन को दबाया जाए. जिस प्रकार भारत में आंदोलनों को दबाने की प्रथा चलती आई है शायद इसका अनुकरण पाकिस्तान भी करेगा और इस जन आंदोलन का भी हाल वही होगा जो भारत में अन्ना हजारे का हुआ था. तहिर उल कादरी द्वारा पाकिस्तान की राजधानी में जनता को इकट्ठा करना पाकिस्तान की सियासत में एक भय की सृष्टि कर रहा है जिससे मुक्ति के लिए लगातार सरकार और प्रधानमंत्री रास्ता खोज रहे हैं.

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लोकतांत्रिक प्रणाली को बरकरार रखना है: ऐसा देखा गया है कि भय के समय में सियासतदारों से ज्यादा धैर्य कोई नहीं रखता है. विश्व राजनीति हो या भारत कोई भी यह नहीं चाहता है कि उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जाए. इन सब के बीच अपनी छवि को कायम रखने के लिए  देश के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ लोकतांत्रिक प्रणाली को बरकरार रखने के नए पैंतरे लेकर सामने आए हैं. उनके अनुसार यह एक ऐसा विद्रोह है जिससे देश की आंतरिक शांति पर आंच आएगी और इससे लड़ने के लिए उन्होंने सारी राजनैतिक पार्टियों को एकजुट होने का आग्रह किया है. अब यह पता नहीं कि यह एकजुटता देश की कार्यप्रणाली को बचाने के लिए की जा रही है या अपनी कुर्सी को बचाने के लिए. इसका फैसला तो आने वाला वक्त ही करेगा!!



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इतनी छोटी सी मांग: सरकार और प्रधानमंत्री के हिसाब से चुनाव में सुधार के लिए इतने बड़े ड्रामे की क्या आवश्यकता थी. इसके लिए आराम से बैठ कर बात हो सकती थी पर ना जाने लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काने में कुछ लोगों को क्या मिलता है. समाज सेवी कहे जाने वाले लोगों से सरकार हाथ जोड़ कर यह प्रार्थना करती रही है कि वो अपना काम समाज तक ही सीमित रखें राजनीति में आकर ज्ञान देना और आवाम को भड़काने की क्या जरूरत है जबकि समाज सेवी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि इनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा. उनका भी हाल वैसा ही होगा जो अन्ना हजारे, बाबा रामदेव का हुआ है और अब तहिर उल कादरी का होने वाला है. इन्हें भी सोचना चाहिए कि जब तक ये सियासत के मामले में दखल नहीं देते हैं तो इनकी कितनी इज्जत की जाती है और फिर क्या जरूरत है बेकार में अपनी इज्जत को दांव पर लगाने की. इन्हें समझना चाहिए कि यह राजनीति है कोई क्रिकेट नहीं जिसमें कभी गेंद इसके पास रहती है तो कभी उसके पास.


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Tags:Pakistan, Anna Hazare, India, Tahir-ul-Qadri, Raja Pervez Ashraf, Nawaj Sarif, Protest, पाकिस्तान, भारत, अन्नाहजारे, तहिरुल कादरी, राजा परवेज अशरफ, नवाज शरिफ



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बादल के द्वारा
January 17, 2013

पहली अपनी हालत पर विचार करें फिर दूसरों की . . . . .

ऋषि के द्वारा
January 17, 2013

शायद इसके बाद यहां बदलाव आ जाए ……….


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